क्या है किसी पालतू जानवर के पीछे की सच्चाई Truth behind pet?

3개월 전


अपने शौक, मनोरंजन और उपयोग के लिए घर पर पालतू जानवर रखना एक बहुत ही साधारण सी बात है। हर कोई अपने शौक और क्षमता के अनुसार अपने घर/ऑफिस/खेत या फार्म हाउस पर पालतू जानवर रखना चाहता है।

हर कोई पालतू जानवर तो रखना चाहता है लेकिन कभी यह नहीं जानना चाहता कि क्या पालतू जानवरों का जीवन जैसा दीखता है वैसा ही होता भी है?

कोई कभी इस बात पर सोच-विचार नहीं करता कि क्या किसी जानवर को पालना वास्तव में पालना ही है? कहीं उन्हें गुलाम बनाना तो नहीं?

कैसा होता है एक पालतू जानवर का जीवन?

किसी भी पालतू जानवर के जीवन को जानने और समझने के लिए पहले हमें पशुओं के बारे में सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होना जरुरी है। हमें पहले उसे पालतू न मानकर एक प्राणी मानना होगा जिसका इस पृथ्वी पर उतना ही स्वतंत्र अस्तित्व है जितना कि इंसान का।

यह एक आम धारणा बन चुकी है कि हमें जब भी कुछ जानवरों के बारे में विचार आते हैं तो यह विचार आता है कि यह तो पालतू जानवर है और इंसान के पालने के लिए ही इस धरती पर है।

लाइव साइंस (और अन्य) के अनुसार, 2013, में दुनिया में सबसे लोकप्रिय पालतू जानवर इस प्रकार हैं - 142 मिलियन मीठे पानी की मछली, 88.3 मिलियन बिल्लियाँ, 74.8 मिलियन कुत्ते, 16 मिलियन पक्षी, 24.3 मिलियन छोटे जानवर, 13.8 मिलियन घोड़े, 13.4 मिलियन सरीसृप, 9.6 मिलियन समुद्री मछली।

वैसे तो पालतू जानवरों की सूची बहुत लम्बी हो सकती है लेकिन हम यहाँ कुत्ते के बारे में ही बात करेंगे जिन्हे अक्सर शौक से पाला जाता है।

कुत्ते को पालने के पीछे जो तर्क सबसे ज्यादा दिया जाता है कि वह एक वफादार जानवर है और इंसान का अच्छा मित्र बनने के सभी गुण उसमें में पाए जाते हैं। लेकिन क्या इतना ही पर्याप्त है किसी जांनवर को पालतू बनाने के लिए या इसके कुछ और पक्ष भी देखे जाने चाहिए?

क्या आपने कभी विचार किया है कि -

दुनिया में कोई भी प्राणी गुलाम बनने के लिए इस धरती पर नहीं आया है। हर प्राणी का अपना स्वतंत्र अस्तित्व और गरिमा होती है। लेकिन जब किसी प्राणी को (यहाँ पर कुत्ते का उदाहरण ले सकते हैं) पालतू बनाया जाता है तो वह अपना अस्तित्व खो देता है और अपनी प्राकृतिक आदतें, जैसे स्वयं शिकार कर खाना इत्यादि ही भूल जाता है।

वह सिर्फ अपने मालिक के दिए भोजन या कहें कि जंक फ़ूड पर ही निर्भर रहने लगता है और उसी का आदि हो जाता हैं। क्या हो यदि किसी इंसान को गुलाम बना कर आजीवन उसे जंक फ़ूड ही खिलाया जाए?

जब भी कोई प्राणी पालतू हो जाता है तो वह एक स्वतंत्र प्राणी न हो कर एक वस्तु बन जाता है, जिसकी खरीद फरोख्त होने लगती है और यह एक बड़े व्यापार का रूप ले लेता है। यहाँ किसी प्राणी के अधिकार गौण हो जाते है और व्यापारी का मुनाफा सर्वोपरि हो जाता है। और यहीं से शुरू होता है पालतू पशुओं पर अत्याचार का अंतहीन सिलसिला।

जब कुत्तों की मांग बढ़ने लगती है तो जाहिर है कि कुत्तों का व्यापार करने वालों को उनका उत्पादन भी बढ़ाना पड़ता है जिसके लिए कृत्रिम गर्भाधान जैसी क्रूरतम विधियों का भी सहारा लिया जाता हैं, में इस क्रिया को बलात्कार कहना उचित समझता हूँ क्योकि किसी भी मादा के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके जननांगों से छेड़छाड़ इसी श्रेणी में आती है।

हर कुत्ते पालने वाले की यह इच्छा व मांग होती है कि उसे बिलकुल नवजात पिल्ला ही मिले जिसे वह अपनी इच्छानुसार पालना चाहता है। यहाँ पर कुत्ते के प्राकृतिक सहज स्वाभाव (natural instinct) की कोई कद्र नहीं करता क्योंकि मालिक उसको अपने इशारों पर ही नाचना चाहता और अपना मनोरंजन करना चाहता है।

यहाँ सबसे क्रूरतम पहलू यह है कि जो पिल्ला आप बाजार से खरीद कर लाते हैं उसे जन्म के तुरंत बाद ही उसकी माँ से अलग कर दिया जाता है, न तो उसे माँ का दूध ही नसीब होता हैं न माँ का वात्सल्य ! दूसरी और उसकी माँ से भी अपने बच्चों पर ममता लुटाने का अधिकार छीन लिया जाता है। इस तरह एक बहुत बड़े मानसिक आघात से शुरू होती है उसकी जीवन यात्रा।

दुनिया में हर प्राणी अपनी प्रजाति के साथ ही रहना चाहता है, क्योंकि हर प्राणी सामाजिक होता है। लेकिन हम इस बात को बिलकुल नज़रअंदाज कर देते हैं और उसे पालने के नाम पर इंसानों के बीच रखने लगते हैं। जरा सोचिये एक नवजात कुत्ते का पिल्ला कितना मासूम होता होगा ? क्या उसे अपनी माँ के ममत्व की, अपने भाई-बहन के साथ अठखेलिया करने का कोई अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं है कि उसे हम अपने स्वार्थ और मनोरंजन के लिए पालतू बनाना चाहते हैं? क्या यह उसके मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं है?

कैसे होती है कुत्तों की ब्रीडिंग?

दरअसल पालने की आड़ में हम अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए जानवरों को गुलाम बना रहे हैं। आज हमने जानवरों की ऐसी नस्लें तैयार कर ली है जो कि सिर्फ इंसानों की गुलामी के लिए ही पैदा की जाती है और गुलामी में ही मर जाती है और हम कहते हैं कि वह हमारा पालतू जानवर है।

इन कृत्रिम नस्लों को आगे बढ़ाने के लिए ब्रीडिंग का सहारा लिया जाता है और ब्रीडिंग में कितनी क्रूरता होती है इसका अंदाजा जानवरों का सौदा करने वाला कभी जान ही नहीं पाता। ब्रीडिंग का सीधा मतलब मादा जानवर का बलात्कार होता है क्योकि वह इंसान अपने स्वार्थ के लिए उससे जबरदस्ती बच्चे पैदा कारवाना चाहता हैं।

इस तरह व्यावसायिक रूप से कुत्ते का उत्पादन ब्रीडिंग सेंटर्स में किया जाता है जिन्हे puppy mills भी कहा जाता है। इस वीडियो में आप देख सकते हैं क्या होती है puppy mills और क्या होता है वहाँ?

देखिये क्या क्रूरता है puppy mills में
ऐसे होता है कुत्तों का कृत्रिम गर्भाधान

चूँकि कुत्ते पालने का शौक अब एक बहुत बड़े बाज़ार का रूप ले चुका है और बाज़ार में जितनी मांग बढ़ेगी उतना ही उत्पादन भी बढ़ेगा।

यहाँ उत्पादन बढ़ने का सीधा सम्बन्ध है कुत्तों पर अत्याचार बढ़ना, जी हाँ वही कुत्ते जिन्हे इंसान अपना सबसे अच्छा दोस्त समझता है। लेकिन किसी कुत्ते से अपना मन बहलाने से पहले यह अवश्य सोचना चाहिए कि वह पिल्ला जो आप खरीद कर लाएं हैं वह किसी माँ का मासूम बच्चा होगा और उस माँ ने किसी ब्रीडिंग सेण्टर में कितने कष्ट सहन कर उसे जन्म दिया होगा।

यहाँ पर हमने सिर्फ कुत्तों पर होने वाले अत्याचारों पर ही रौशनी डालने की कोशिश की है लेकिन ऐसा ही अत्याचार लगभग उन सभी पशु, पक्षी या मछलियों पर भी होता है जिन्हें हम अपने घर में पालतू बनाने की इच्छा रखते हैं।

क्या विकल्प हो सकता है पालतू जानवर का?

हमारे पास तो बहुत से विकल्प और कारण हो सकते हैं कि हम किसी जानवर को पालतू बना कर न रखें, लेकिन अगर हम पालतू जानवर रखते हैं तो फिर उन प्राणियों के पास कोई विकल्प नहीं होता सिवाय आजीवन इंसानों की गुलामी करने और अत्याचार सहने करने के।

अगर हमारे मन में सच में जानवरों के प्रति करुणा का भाव है और यदि किसी जानवर का सामीप्य हमे अच्छा लगता है जैसे कुत्ते का तो इसका एक अच्छा तरीका हो सकता है कि हम कुत्ते को ख़रीदने और उसका मालिक बनने के बजाय किसी सड़क पर भटकते हुए कुत्ते को शरण दें और उसके खाने और पानी का समुचित प्रबंध करें। ऐसी स्थिति में वह हमारे पास होते हुए भी हमारा नहीं होगा और उसका स्वतंत्र अस्तित्व बरक़रार रहेगा।

किसी भी तरह के पशु उत्पादों का अपने जीवन में उपयोग न करने अथवा पशुओं को गुलाम न बनाने की विचारधारा को वीगनिस्म कहा जाता है और जो ऐसा करने में विश्वास करते हैं उन्हें वीगन कहा जाता है।

इस सम्बन्ध में आप विस्तार से इस पोस्ट में पढ़ सकते है -

क्या होता है वीगनिस्म (VEGANISM), कौन होते हैं वीगन(VEGANS)?



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